फर्जी बिल जारी करने के आरोपित को जमानत, राजस्थान हाई कोर्ट का अहम रुख


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-12-05 05:27:59



 

राजस्थान हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण मामले में जमानत का आदेश दिया है, जिसमें एक व्यक्ति पर फर्जी इनवॉयस जारी करने का आरोप था। अदालत ने यह फैसला इस आधार पर दिया कि आरोप पत्र में यह साबित नहीं हो सका कि आरोपित द्वारा जारी किए गए इनवॉयस के आधार पर दावा किए गए जीएसटी रिफंड के लिए संबंधित कंपनियां अस्तित्व में नहीं थीं। इस फैसले ने कई सवाल उठाए हैं और यह भी ध्यान आकर्षित करता है कि अदालत ने जांच एजेंसियों द्वारा पेश किए गए सबूतों को अपर्याप्त करार दिया।

फर्जी इनवॉयस का मामला: आरोपित पर क्या आरोप थे?

इस मामले में, आरोपित पर आरोप था कि उसने नौ काल्पनिक कंपनियों के नाम पर फर्जी इनवॉयस जारी किए थे, जिसके परिणामस्वरूप जीएसटी की चोरी हुई और इन फर्जी इनवॉयस के आधार पर इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा किया गया। आरोपित के खिलाफ केंद्रीय जीएसटी एक्ट, 2017 की धारा 132(1)(a), (f), (h) और (l) के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोपित ने इस मामले में जमानत के लिए धारा 439 क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के तहत आवेदन किया था, जिस पर सुनवाई के बाद अदालत ने जमानत का आदेश दिया।

कोर्ट का नजरिया: जांच एजेंसियों पर उठाए सवाल

कोर्ट की बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति गणेश राम मीना शामिल थे, ने कहा कि आरोप पत्र में यह सिद्ध नहीं किया गया कि इन फर्जी कंपनियों का अस्तित्व नहीं था। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि विभाग ने केवल यह कहा था कि इन कंपनियों के मालिकों का पता नहीं चल सका, लेकिन इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया गया कि इन कंपनियों का जीएसटी पंजीकरण रद्द किया गया है। अदालत ने विभाग द्वारा किए गए अनावश्यक और अपर्याप्त जांच पर सवाल उठाए और यह कहा कि बिना उचित सत्यापन के किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना सही नहीं था।

आरोपित को मिली जमानत: कोर्ट ने क्या तर्क दिए?

कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपित को जमानत देने के पक्ष में कई तर्क थे। सबसे पहले, आरोपित को सात महीने से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया था, और जैसा कि आरोपों में अधिकतम सजा पांच साल तक की हो सकती है, इसलिए यह उचित नहीं था कि उसे अनिश्चितकाल के लिए हिरासत में रखा जाए। इसके अलावा, यह भी ध्यान में रखा गया कि आरोपित के खिलाफ जो अपराध आरोपित किए गए हैं, वे समायोज्य (compoundable) हैं और मामले की सुनवाई में समय लग सकता है, इसलिए जमानत देने का निर्णय लिया गया।

कोर्ट ने की इनपुट टैक्स क्रेडिट के दावे पर अनसुलझे सवालों की ओर इशारा

अदालत ने यह भी माना कि आरोपित द्वारा जारी किए गए कथित फर्जी इनवॉयस के आधार पर जीएसटी इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा करने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। कोर्ट ने यह सवाल उठाया कि आखिरकार यह प्रमाणित करने वाला कोई व्यक्ति नहीं आया, जिसने यह दावा किया हो कि उसने इन फर्जी बिलों के आधार पर टैक्स क्रेडिट लिया। यह असमंजस अदालत के फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू था, क्योंकि आरोपित के खिलाफ इतने गंभीर आरोप होने के बावजूद ठोस प्रमाण का अभाव था।

क्या है कोर्ट का अंतिम निर्णय?

कोर्ट ने सबूतों के अभाव और जांच एजेंसियों की विफलता को देखते हुए आरोपित को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। अदालत का यह कदम यह स्पष्ट करता है कि जब तक आरोपों को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त और ठोस प्रमाण नहीं होते, तब तक आरोपित को बिना किसी आधार के निरंतर हिरासत में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में पूरी जांच का निष्कर्ष जल्द से जल्द पेश किया जाना चाहिए, ताकि मामले की सुनवाई के लिए उचित कदम उठाए जा सकें।


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