बॉम्बे हाई कोर्ट ने गर्भवती पत्नी की हत्या के दोषी पुलिसकर्मी को समयपूर्व रिहाई की अनुमति दी
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-04 06:02:01

बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में प्रदीपसिंह ठाकुर, एक पूर्व पुलिसकर्मी, को गर्भवती पत्नी की हत्या के मामले में समयपूर्व रिहाई की अनुमति दी है। कोर्ट ने माना कि गला घोंटकर हत्या करना असाधारण रूप से हिंसक या क्रूर नहीं माना जा सकता, और इसलिए ठाकुर को 22 वर्ष की सजा के लिए पात्र ठहराया।
मामले की पृष्ठभूमि
2001 में, प्रदीपसिंह ठाकुर ने अपनी गर्भवती पत्नी की गला घोंटकर हत्या कर दी थी, क्योंकि उसने दहेज की मांग पूरी नहीं की थी। निचली अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई, जिसे बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट ने आजीवन कारावास में बदल दिया। ठाकुर ने 15 मार्च 2010 के सरकारी संकल्प के तहत समयपूर्व रिहाई की मांग की थी।
सरकारी संकल्प और छूट के दिशा-निर्देश
15 मार्च 2010 के सरकारी संकल्प में अपराधियों को छूट देने के लिए विभिन्न श्रेणियाँ निर्धारित की गई हैं। ठाकुर ने श्रेणी 2(बी) के तहत छूट की मांग की, जो पूर्व-योजनाबद्ध लेकिन असाधारण क्रूरता के बिना अपराधों के लिए है। राज्य ने उनकी याचिका खारिज कर दी, यह कहते हुए कि घटना के समय वह पुलिसकर्मी थे और उनकी पत्नी गर्भवती थी।
कोर्ट की टिप्पणियाँ
कोर्ट ने कहा कि गला घोंटकर हत्या करना हिंसक तो है, लेकिन इसे असाधारण रूप से क्रूर नहीं माना जा सकता। मृतका के शरीर पर केवल गला घोंटने के निशान और एक खरोंच थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि हत्या पूर्व-योजनाबद्ध थी, लेकिन असाधारण क्रूरता के बिना।
पुलिसकर्मी होने का प्रभाव
राज्य ने ठाकुर की पुलिसकर्मी की भूमिका को छूट से इनकार करने का आधार बनाया। कोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि केवल पुलिसकर्मी होने और गर्भवती पत्नी की हत्या करने से छूट के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि छूट के नियम सभी दोषियों पर समान रूप से लागू होते हैं, बिना किसी भेदभाव के।
निर्णय और निर्देश
कोर्ट ने राज्य के आदेश को रद्द करते हुए ठाकुर को 22 वर्ष की सजा के लिए पात्र ठहराया। अब, प्रशासनिक समीक्षा के बाद, वह समयपूर्व रिहाई के लिए पात्र हो सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि छूट के नियमों का उद्देश्य सभी दोषियों को समान अवसर प्रदान करना है, और किसी विशेष श्रेणी के दोषियों को छूट से वंचित नहीं किया जा सकता।
यह निर्णय छूट के नियमों की समानता और अनुपातिकता के सिद्धांत को स्पष्ट करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सभी दोषियों को समान अवसर मिले, बिना किसी भेदभाव के।