ना पहले डरे, ना अब डरेंगे ,पत्रकारिता दबंगता से करेंगे, इफ बट किंतु परंतु कुछ नहीं ,जो लिखेंगे सच लिखेंगे सच के सिवा कुछ ना लिखेंगे तेरी दो टक्कया दी नौकरी- मेरा लाखों का सावन जाये।
के कुमार आहूजा, अजय त्यागी 2024-12-03 21:32:15

इस गाने में सावन को मारो गोली यहाँ तो जान जा रही थी। नौकरी करना कोई आसान कार्य नहीं है। हर वक्त कार्य में मुस्तेद रहना पड़ता है। आकाओ को खुश रखने के साथ मातहत कर्मचारियों को भी खुश रखना पड़ता है। कभी- कभी उन्हें खुश करते करते उनकी नाखुशी भी झेलनी पड़ती है। ऐसा ही एक वाक़या मेरे साथ गुजरा, उसे मैं आपको वाक़िफ़ करा दु। लेकिन इससे पहले इसकी पृष्ठभूमि पर आता हूँ। मन्त्री जी की नाराजगी के कारण मैं बार- बार होते तबादलों से बेहद परेशान था बीकानेर से कभी श्रीगंगनगर- कभी नागौर- कभी सीकर- कभी बूंदी - कभी कोटा और कभी झुनझनू में पीआरओ पद पर जा चुका था। नौकरी छोड़ने का मानस भी बना चुका था कि अचानक एक दिन बीकानेर क्लेक्ट्रेट से पीए का फ़ोन आया कि आप अजमेर के कलेक्टर आर एन मीणा से बात करे। उनका नम्बर यह है। यह मुझे मालूम था कि आर एन मीणा पहले बीकानेर में कलेक्टर थे उनका कार्यकाल आन- बान और शान का रहा। वे सुबह घोड़े पर सवार होकर दल- बल सहित शहर का निरीक्षण करते। समस्याएँ देखते और फिर उन्हें दूर करते। जन- जन की तकलीफ़ों की सुनवाई करते और फिर उन्हें दुर करने का पूरा प्रयास करते। हर जुबा पर उनका नाम था। वहाँ के मन्त्री जी को भला यह सहन कैसे होता और उन्होंने उनका ट्रांसफ़र अजमेर करा दिया। वैसे ही जैसे सम्भागीय आयुक्त नीरज के पवन का हुआ। ख़ैर- जब श्री मीणा ने मुझे याद किया तब मैंने उनसे फ़ोन पर बात की और उन्होंने मुझे कहा कि फ़ोरन अजमेर पीआरओ पद पर आ जाओ। मैंने कहा कि मैं झुनझनु पदस्थापित हूँ उन्होंने कहा कि मैंने मुख्य सचिव से बात कर ली है वहाँ से रिलीव होकर अजमेर आ जाओ। आदेश मैंने भिजवा दिए है। शायद उन्हें यह मालूम हो गया था कि जिस मंत्री से वे प्रताड़ित हुए थे उसी से मैं भी ज़बरदस्त प्रताड़ित था। ख़ैर मैंने उनके आग्रह को मानते हुए अजमेर ज़्वाइन कर लिया। और पीआरओ कैम्पस में आवास में भी रहने लगा। मेरा कलेक्टर से अच्छा समन्वय रहा। खूब उनसे जमी और बखूबी कार्य हो रहा था। अब आते है मुख्य घटना पर— ब्यावर का एपीआरओ ऑफिस भी मेरे अधीन था। प्यारे मोहन तिरपाठी वहाँ एपीआरओ थे और कर्मचारी भंवरसिंह राठौड़ था जो कर्मचारियों का नेता था और प्रदेश कर्मचारी संघ के अध्यक्ष उदयसिंह राठौड़ का राइट हैण्ड था वो कभी ऑफिस नहीं जाता था और उसके तनख़्वाह के बिल मुझे पास करने होते थे। उसकी मनमानी से एपीआरओ और कर्मचारी स्टाफ़ भी भयभीत रहते थे। उसने हमारे पीआरओ ऑफिस में अपना घर बना रखा था। मैं उसे बार- बार ब्यावर ऑफिस जाने का आग्रह करता वह उलटा मुझे ही धमकी देता कि आप अपने काम से मतलब रखो। और अपनी कुर्सी का ध्यान रखो ,और मस्त रहो। लेकिन मुझसे रहा नहीं गया कि वो महीने भर ऑफिस न जाये और मैं उसकी तनख़्वाह का बिल पास करूँ। मैंने उसके वेतन बिल पर हस्ताक्षर नहीं किये। फिर क्या था एक रात्रि मैं होटल से खाना खाकर वापिस अपने पीआरओ अवास पर लोट रहा था कि भंवरसिंह राठौड़ ने पीछे से मुझ पर कुल्हाड़ी से वॉर किया। चोकीदार ने देख लिया। वो मुझे बचाने के लिए आगे आया तब तक कुल्हाड़ी मेरी गर्दन और कन्धे पर लग चुकी थी मैं बचाओ- बचाओ चिल्लाया और अपने बचाव का प्रयास करता रहा। मेरी आवाज़ से दो राहगीर भागे- भागे आये जिन्हें देखकर भंवरसिंह भाग गया। मैंने चोकीदार और राहगीरों के साथ जाकर पुलिस चौकी में एफ़आइआर लिखवाई। पुलिस ने मेरा मेडिकल करवाया और भंवरसिंह की गिरफ़्तारी का वॉरंट निकला। और मैंने अगले दिन मैजिस्ट्रेट के सामने ग्वाहो के बयान भी क्लमबद्ध करवाये। भंवरसिंह फ़रार था अख़बार की सुर्ख़ियों में पूरी घटना का वर्णन था। निदेशक मनोहर प्रभाकर मुझसे काफ़ी नाराज़ हुए कि यह क्या कर दिया ?क्योंकि उन पर प्रदेश नेता उदयसिंह राठौड़ का ज़बरदस्त प्रभाव था। उन्होंने मुझे केस वापिस लेने को कहा, मैंने केस वापिस नहीं लिया। मुझे भी कई चेतावनियाँ- धमकियाँ मिली। काफ़ी मुझ पर दबाव भी डाला गया। लेकिन मैं पीछे नहीं हटा। आख़िर भंवरसिंह गिरफ़्तार हुआ और फिर उसकी जमानत भी हो गई। कोर्ट में सालो- साल केस चला। तारीख़ पर तारीख़ मिलती रही। मैं पदोन्नति पर जयपुर आ गया। मेरे और गवाहों के बयान न हो इसे रोकने के लिए तारीख़ पर तारीख़ मिलती रही। कई सालो बाद उस समय सत्र न्यायाधीश रहे कन्हैया लाल व्यास से मैं मिला और मेरे बयान दर्ज न हो इस पर तारीख़ पर तारीख़ मिलने की बात कही। उन्होंने अगली पेशी पर मेरे बयान करवा दिए। लेकिन निर्णय क्या रहा मुझे मालूम नहीं। मैं सेवा से रिटायर्ड होकर २००२ में बीकानेर आ गया। और आज मैं आपसे नौकरी के कार्यकाल में बीती घटना शैयर कर रहा हूँ। कि सही राह पर चलने वालो को नौकरी में कितनी परेशानी का सामना करना पड़ता है। आप भी शायद ऐसे किसी दौर से अवश्य गुजरे होंगे। इसलिये ईमानदारी से नौकरी करना कोई आसान नहीं !फिर भी जिसके साथ ऊपरवाला है उसका कोई बाल- बाँका भी नहीं कर सकतासटीक, निर्भीक,निष्पक्ष बैैकोफ (मनोहर चावला )किसी परिचय के मोहताज नहीं