मद्रास हाईकोर्ट ने पिटीशनर पर ₹25,000 का जुर्माना लगाया, शवयात्रा को लेकर दिया बड़ा फैसला


के कुमार आहूजा  2024-12-02 09:18:10



 

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें एक पिटीशनर द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए ₹25,000 का जुर्माना लगाया। पिटीशनर ने यह याचिका एक खास समुदाय के लोगों के शवयात्रा को उनके निवास स्थान के पास से गुजरने से रोकने के लिए दायर की थी। कोर्ट ने इस याचिका को "निर्दयी" करार देते हुए इसे अस्वीकार कर दिया और पिटीशनर से लागत वसूलने का आदेश दिया।

पिटीशन का कारण और कोर्ट की टिप्पणी

यह याचिका कम्मावर समुगा नाला संघम द्वारा दायर की गई थी, जिसमें चार व्यक्तियों को, जो तमिलनाडु के विरुधुनगर जिले के निवासी थे और एक खास समुदाय से संबंधित थे, अपने क्षेत्र के निवासी गलियों से शवयात्रा न निकालने की मांग की गई थी। पिटीशनर का आरोप था कि इन शवयात्राओं के कारण सार्वजनिक कष्ट और अव्यवस्था उत्पन्न हो रही थी। उन्होंने स्थानीय अधिकारियों से अनुरोध किया कि ये शवयात्राएं मुख्य सड़क या अन्य रास्तों से निकाली जाएं।

हालांकि, मद्रास हाईकोर्ट ने इस याचिका को गंभीरता से लेते हुए तीखी टिप्पणी की। न्यायमूर्ति एमएस रमेश और न्यायमूर्ति एडी मारिया क्लेट ने कहा, "यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 15 के तहत भेदभाव करने वाली है। सार्वजनिक सड़कें और रास्ते जो किसी पंचायत के तहत आते हैं, सभी निवासियों के लिए खुले होते हैं, चाहे वे किसी भी जाति, समुदाय या धर्म से संबंधित हों।"

याचिका सार्वजनिक शांति और सामूहिक सद्भाव के खिलाफ

कोर्ट ने याचिका को नकारते हुए कहा कि यह याचिका सार्वजनिक शांति और सामूहिक सद्भाव के खिलाफ थी। कोर्ट ने कहा, "हम समझ नहीं पा रहे हैं कि शवयात्रा को सार्वजनिक उपद्रव कैसे माना जा सकता है। याचिका दायर करने वाले संगठन को अपने सदस्य welfare पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि इस प्रकार की अव्यवस्था पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए।"

न्यायालय ने कहा कि इस प्रकार की याचिकाओं से गांवों में असहमति और अशांति फैलने का खतरा हो सकता है। इस कारण से कोर्ट ने इस याचिका को खारिज किया और पिटीशनर संघ को ₹25,000 का जुर्माना लगाने का आदेश दिया। यह राशि मदुरै बेंच के लीगल सर्विसेज कमेटी को दी जानी थी।

पिटीशनर का तर्क और कोर्ट की प्रतिक्रिया

पिटीशनर का कहना था कि जब शवयात्राएं उनके क्षेत्र से गुजरती हैं, तो यह इलाके में रहने वाले लोगों के लिए कष्टकारी हो जाती हैं, और यह सड़क पर यातायात में रुकावट उत्पन्न करती हैं। लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया और कहा कि किसी शवयात्रा को सार्वजनिक उपद्रव मानना पूरी तरह से निराधार है।

कोर्ट ने आगे कहा कि पिटीशनर के इस प्रकार के तर्क और याचिका से समाज में तनाव उत्पन्न हो सकता था, जो कि कानून की नज़र में अस्वीकार्य है। कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि सार्वजनिक सड़कें सभी के उपयोग के लिए हैं और किसी भी एक समुदाय के अधिकार को नकारा नहीं किया जा सकता।

फैसले का महत्व और समाज पर प्रभाव

यह निर्णय एक महत्वपूर्ण संदेश भेजता है कि किसी भी समुदाय को सार्वजनिक स्थानों के उपयोग में भेदभाव का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि हर नागरिक का समान अधिकार है कि वह सार्वजनिक स्थानों का उपयोग करे, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या समुदाय से संबंधित हो।


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