सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी के आदेश को खारिज किया: राजस्व के आधार पर पर्यावरणीय जुर्माना लगाने पर उठाए सवाल
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-02 08:03:47

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के उस आदेश पर असंतोष जताया, जिसमें एक कंपनी पर पर्यावरणीय नुकसान के लिए जुर्माना लगाया गया था। यह जुर्माना कंपनी के राजस्व के आधार पर निर्धारित किया गया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह से अनुचित और अव्यवस्थित करार दिया। कोर्ट ने कहा कि कंपनी के राजस्व और पर्यावरणीय नुकसान के जुर्माने के निर्धारण में कोई संबंध नहीं है।
एनजीटी के आदेश का विश्लेषण
यह मामला एक कंपनी द्वारा दायर की गई याचिका से जुड़ा था, जिसमें उसने एनजीटी के आदेश को चुनौती दी थी। एनजीटी ने कंपनी पर 25 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था, और इसका कारण कंपनी का वार्षिक राजस्व था, जो 100 करोड़ से लेकर 500 करोड़ रुपये तक था। एनजीटी ने कहा था कि कंपनी का राजस्व उसके पर्यावरणीय दायित्वों को प्रभावित करता है, इसलिए जुर्माने की राशि इसी आधार पर निर्धारित की गई।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी के आदेश को खारिज करते हुए तीन मुख्य खामियों पर ध्यान केंद्रित किया। पहले, कोर्ट ने कहा कि 100 करोड़ और 500 करोड़ रुपये के बीच बहुत बड़ा अंतर है, और इसे एक समान तरीके से आंकना सही नहीं है। दूसरे, एनजीटी ने जुर्माना निर्धारण के लिए सार्वजनिक डोमेन से जानकारी ली थी, लेकिन फिर भी कोई स्पष्ट आंकड़ा सामने नहीं आया। तीसरे, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि कंपनी का राजस्व पर्यावरणीय नुकसान के जुर्माने के निर्धारण के लिए कोई प्रासंगिक तत्व नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “किसी भी स्थिति में, राजस्व का उत्पादन पर्यावरणीय नुकसान के लिए निर्धारित जुर्माने की राशि से संबंधित नहीं हो सकता...हम इसे बेहद दुखद तरीके से कहते हैं कि एनजीटी द्वारा अपनाई गई जुर्माना निर्धारण की पद्धति कानून के सिद्धांतों से पूरी तरह अनजान है।"
न्यायिक प्रक्रिया में असहमति
इसके अतिरिक्त, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह एनजीटी का तीसरा ऐसा आदेश था, जिसे उसने बिना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए और उचित विचार किए हुए पारित किया था। अदालत ने पाया कि इस मामले में आरोपित कंपनी द्वारा कोई उल्लंघन नहीं किया गया था, और न ही उसके खिलाफ कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत किए गए थे।
एनजीटी की अव्यवस्थित प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी की प्रक्रिया को लेकर कड़ी टिप्पणी की और कहा कि जुर्माना लगाने के दौरान कानूनी प्रक्रियाओं और प्राकृतिक न्याय का पालन किया जाना चाहिए था, जो कि इस मामले में पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया था। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि एनजीटी ने कंपनी को जुर्माना लगाए जाने से पहले नोटिस तक जारी नहीं किया था, जो कि एक कानूनी आवश्यकता है।
न्यायालय में पेश हुए वकील
इस मामले में कंपनी का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एन.एस. नादकर्णी ने रखा, जबकि एनजीटी के खिलाफ वकील फेरोज अहमद ने और महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से वकील मुकेश वर्मा ने प्रस्तुत किया।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय पर्यावरणीय मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को फिर से परिभाषित करता है। यह अदालत ने यह स्पष्ट किया कि जुर्माने का निर्धारण सिर्फ वित्तीय आंकड़ों या राजस्व के आधार पर नहीं किया जा सकता है। इसके बजाय, यह पर्यावरणीय नुकसान की वास्तविकता और उल्लंघन की गंभीरता के आधार पर होना चाहिए। इस निर्णय से यह भी संदेश मिलता है कि न्यायिक प्रक्रियाओं में उचित विचार-विमर्श और प्राकृतिक न्याय का पालन अत्यंत आवश्यक है।