खबर कानून और अपराध ,नियमों के तहत जुड़ी हुई क्या सचमुच जातिवादी संदेश थे? बॉम्बे हाईकोर्ट ने दिया अहम फैसला
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-02 06:40:04

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में एक महिला के खिलाफ मामला खारिज कर दिया, जिसे SC/ST एक्ट के तहत आरोपित किया गया था। महिला पर आरोप था कि उसने अपने पूर्व बॉयफ्रेंड को रिश्ते को खत्म करने के दौरान जातिवादी संदेश भेजे थे। न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फालके ने इस मामले की सुनवाई के बाद पाया कि इन संदेशों में कोई जातिवाद से संबंधित घृणा या वैमनस्य नहीं था, और इस प्रकार यह मामला SC/ST एक्ट के तहत नहीं आता।
मामला क्या था?
यह मामला मध्य प्रदेश के नागपुर निवासी 29 वर्षीय सॉफ़्टवेयर इंजीनियर और 28 वर्षीय महिला के बीच के एक रिश्ते से संबंधित था। दोनों का कहना था कि उन्होंने एक मंदिर में गुपचुप तरीके से शादी की थी, जिसे दोनों के परिवारों से छिपा कर रखा गया था। हालांकि, बाद में रिश्ते में खटास आ गई, जब महिला को यह पता चला कि उसका पार्टनर चांभर समुदाय से है, जो कि एक अनुसूचित जाति है। इसके बाद महिला ने कथित तौर पर अपने पूर्व बॉयफ्रेंड को जातिवादी संदेश भेजे थे, जिसके बाद उसने शिकायत दर्ज कराई।
महिला के पिता को भी इस मामले में आरोपी बनाया गया था, यह आरोप था कि उन्होंने अपनी बेटी के जातिवादी संदेशों का समर्थन किया था।
महिला ने भेजे थे "जातिवाद पर विचार"
कोर्ट में प्रस्तुत व्हाट्सएप संदेशों में जाति आरक्षण पर महिला की व्यक्तिगत राय का उल्लेख था, लेकिन इन संदेशों में अनुसूचित जाति और जनजातियों के खिलाफ कोई नफरत या घृणा फैलाने का प्रयास नहीं था। न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फालके ने कहा, "इन संदेशों में केवल जाति आरक्षण प्रणाली पर विचार व्यक्त किए गए थे। इनमें ऐसा कोई शब्द नहीं था जो अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के खिलाफ घृणा या वैमनस्य को बढ़ावा देता हो।"
क्या SC/ST एक्ट का उल्लंघन हुआ था?
इस मामले में SC/ST एक्ट के तहत आरोप था कि महिला ने अपने संदेशों से अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ नफरत और वैमनस्य फैलाने की कोशिश की। लेकिन कोर्ट ने कहा कि इन संदेशों से कोई अपराध नहीं बनता, क्योंकि इन संदेशों में किसी भी तरह का जातिवाद नहीं था। न्यायमूर्ति जोशी-फालके ने यह भी कहा कि इस प्रकार की टिप्पणियां केवल महिला के व्यक्तिगत विचार थीं, और उनका किसी समुदाय के खिलाफ घृणा या वैमनस्य फैलाने का उद्देश्य नहीं था।
अदालत का फैसला और महिला का पक्ष
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि शिकायतकर्ता के वकील ने यह दावा किया था कि इन संदेशों से समुदायों के बीच घृणा फैलने का प्रयास किया गया, जबकि बचाव पक्ष का कहना था कि ये केवल महिला के व्यक्तिगत विचार थे और इनसे कोई गलत इरादा नहीं था। अदालत ने यह माना कि शिकायत में देरी की गई थी और इस मामले में कुछ छिपे हुए उद्देश्य हो सकते थे।
न्यायमूर्ति जोशी-फालके ने कहा, "SC/ST एक्ट का उद्देश्य अनुसूचित जातियों और जनजातियों के सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार करना है, और उन्हें किसी भी प्रकार की अपमानजनक स्थिति से बचाना है। इस कानून के तहत किए गए अपराधों को सजा दी जाती है, लेकिन इस मामले में कोई अपराध नहीं था।"
न्यायालय का अंतिम निर्णय
अदालत ने मामले की पूरी तरह से जांच की और पाया कि महिला द्वारा भेजे गए संदेश SC/ST एक्ट के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आते। इसके बाद, अदालत ने अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें महिला और उसके पिता को आरोपों से मुक्त कर दिया गया था।