शम्सी शाही मस्जिद पर विवाद: हिंदू संगठन के दावे को कोर्ट में मिली तगड़ी चुनौती
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-12-01 05:38:11

शम्सी शाही मस्जिद को लेकर एक नया विवाद सामने आया है, जिसमें हिंदू संगठन ने इसे एक प्राचीन नीलकंठ महादेव मंदिर होने का दावा किया है। शनिवार को इस मामले में शम्सी शाही मस्जिद के प्रबंधन समिति ने अदालत में अपनी दलील पेश की, जिसमें उन्होंने इस दावे को खारिज कर दिया और इसे अस्वीकार्य बताया। मस्जिद प्रबंधन समिति और वक्फ बोर्ड ने अपनी ओर से इस मामले पर तर्क प्रस्तुत किए। मामला पहले 2022 में सामने आया था, और अब अदालत ने इसे 5 दिसंबर तक के लिए स्थगित कर दिया है।
संदर्भ और विवाद का विस्तार
यह घटना उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में चल रहे एक धर्मिक विवाद के संदर्भ में सामने आई है, जहां एक हिंदू संगठन ने मस्जिद के भीतर पूजा करने की अनुमति की मांग की थी, यह कहते हुए कि वहां पहले एक मंदिर था। यह मामला अदालत में लंबी सुनवाई के बाद बढ़ा, और मस्जिद के प्रबंधन ने अदालत में दावा किया कि वहां कोई मंदिर नहीं था। इस दौरान एक मस्जिद में सर्वे के खिलाफ एक हिंसक विरोध प्रदर्शन भी हुआ था, जिसमें पांच लोग मारे गए थे और कई अन्य घायल हो गए थे। यह प्रदर्शन बरेली जिले के समीप संभल में हुआ था, जिसमें एक मस्जिद के सर्वे को लेकर हिंसा भड़क उठी थी।
शम्सी शाही मस्जिद का ऐतिहासिक महत्व
शम्सी शाही मस्जिद, जो बदायूं शहर के सोथा मोहल्ला इलाके में स्थित है, शहर की सबसे ऊँची इमारत मानी जाती है। यह मस्जिद भारत की तीसरी सबसे पुरानी और सातवीं सबसे बड़ी मस्जिद मानी जाती है, जिसमें 23,500 लोग एक साथ नमाज अदा कर सकते हैं। मस्जिद के निर्माण का समय लगभग 850 वर्ष पहले का माना जाता है, और इसके निर्माण में हिंदू और मुस्लिम दोनों प्रकार की वास्तुकला के तत्व शामिल हैं।
वकीलों की दलीलें और कोर्ट में तर्क
मस्जिद समिति और वक्फ बोर्ड की ओर से वकील अनवर आलम और असरार अहमद ने कोर्ट में अपनी दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 7 रूल 11 के तहत आता है, जो किसी भी मुकदमे को खारिज करने का अधिकार देती है यदि वह किसी कानून से बाधित हो। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू महासभा को इस मामले में कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि शम्सी शाही मस्जिद 850 साल पुरानी है और यहां कोई मंदिर नहीं था। वक्फ बोर्ड ने दावा किया कि इस मस्जिद की वैधता को चुनौती देना गलत है।
हिंदू पक्ष की प्रतिक्रिया और अगले कदम
वहीं, हिंदू पक्ष के वकील विवेक रेन्द्र ने अदालत में तर्क दिया कि उनके पास "ठोस सबूत" हैं जो यह साबित करते हैं कि यहां पहले एक मंदिर था और उनकी मांग है कि हिंदू श्रद्धालुओं को पूजा करने की अनुमति दी जाए। उन्होंने कहा कि अदालत में पेश किए गए सभी दस्तावेज़ इस दावे का समर्थन करते हैं। वे उम्मीद करते हैं कि अदालत से उन्हें न्याय मिलेगा। इस मामले की अगली सुनवाई 5 दिसंबर को होगी।
बढ़ते मंदिर-मस्जिद विवाद और समाज पर असर
हाल के समय में उत्तर प्रदेश में मस्जिद और मंदिरों को लेकर कई विवाद सामने आए हैं, जिससे धार्मिक तनाव भी बढ़ा है। इन विवादों के चलते कुछ क्षेत्रों में साम्प्रदायिक तनाव भी देखा गया है। 27 नवंबर को एक और मामला सामने आया, जिसमें राजस्थान के अजमेर में सूफी संत मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में एक शिव मंदिर होने का दावा किया गया। यह मामले लगातार अदालतों में लंबी सुनवाई का कारण बनते जा रहे हैं।