सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: प्रेमिका की आत्महत्या में प्रेरणा का आरोप नकारा! जानें पूरा मामला


  2024-11-30 18:38:20



 

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में एक व्यक्ति की आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप से मुक्ति दिलाई। यह मामला एक प्रेमिका की आत्महत्या से जुड़ा था, जब उसे शादी के प्रस्ताव से इनकार मिलने पर उसने आत्मघाती कदम उठाया। कोर्ट ने इस मामले में यह स्पष्ट किया कि सिर्फ शादी से इनकार करना आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला नहीं बनता। तो, आइए जानते हैं इस मामले की पूरी कहानी और सुप्रीम कोर्ट ने क्या महत्वपूर्ण फैसले दिए।

मामले की शुरुआत:

यह मामला उस समय चर्चा में आया जब एक व्यक्ति पर अपनी प्रेमिका को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगा। आरोप था कि उसने अपनी प्रेमिका को शादी के लिए मना किया, जिसके बाद महिला ने आत्महत्या कर ली। महिला की मौत के बाद, आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय:

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आरोपी की सजा को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति उज्जल भूयान की पीठ ने स्पष्ट किया कि सिर्फ शादी से इनकार करना आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला नहीं हो सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति के द्वारा सिर्फ विवाह का प्रस्ताव अस्वीकार करना और टूटे रिश्ते को लेकर आत्महत्या करना, यह एक अलग मामला है, जिसका अदालत में अपराध के रूप में ट्रायल नहीं हो सकता।

कोर्ट का महत्वपूर्ण अवलोकन:

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि इस तरह के मामलों में यह दिखाना जरूरी है कि आरोपी ने अपने कृत्यों से ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कीं कि मृतक के पास आत्महत्या के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि टूटे हुए रिश्ते और दिल टूटने को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा माना जाता है और यह आत्महत्या के लिए उकसाने का कारण नहीं हो सकता।

कोर्ट ने यह भी बताया कि आरोपी ने किसी तरह से मृतका को आत्महत्या के लिए उकसाया नहीं, बल्कि मृतका ने खुद ही कर्नाटका के काकति जाने के दौरान एक बोतल में जहर रखा और केवल एक उद्देश्य से आरोपी से शादी के लिए सकारात्मक उत्तर प्राप्त करने की कोशिश की। जब उसने ऐसा नहीं किया, तो मृतका ने आत्महत्या का कदम उठाया।

प्रपोजल के बिना 'सिर्फ़ टूटा हुआ रिश्ता':

कोर्ट ने कहा कि भले ही यह माना जाए कि आरोपी ने मृतका से शादी का वादा किया था, तो भी यह केवल एक टूटा हुआ रिश्ता था, जिसके लिए कानून में अलग से कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन इसे आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि मामले में आरोपी के मन में दोषी इरादा (mens rea) का कोई संकेत नहीं था, इस कारण उसे सजा नहीं दी जा सकती।

अदालत का फैसला और इसके प्रभाव:

सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकार अपील स्वीकार की और निचली अदालत द्वारा आरोपी को दी गई सजा को रद्द कर दिया। इस निर्णय ने यह साबित किया कि रिश्तों में टूटन या विवाह के प्रस्तावों से इनकार को आत्महत्या के लिए उकसाने का कारण नहीं बनाया जा सकता। यह निर्णय उन मामलों के लिए एक मार्गदर्शन हो सकता है, जहां रिश्ते टूटने या दिल टूटने को लेकर आत्महत्या की घटनाएँ होती हैं।


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