कर्नाटक उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय: लेखन बयान से पहले मध्यस्थता आवेदन पर कोई अधिकार क्षेत्र का त्याग नहीं
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-11-30 05:29:34

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 8 के तहत आवेदन पहले बयान के प्रस्तुत करने से पहले दायर किया जाता है, तो इसे अधिकार क्षेत्र के त्याग के रूप में नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति एच.पी. संदीश की पीठ ने यह आदेश दिया।
मामले का विवरण:
उत्तरदाताओं ने एक मुकदमा दायर किया, जिसमें उन्होंने 'एग्रीमेंट एंड कन्फर्मेशन' को अमान्य घोषित करने, संपत्ति पर पूर्ण स्वामित्व की घोषणा, और अपीलकर्ता को संपत्ति पर विकास, हस्तांतरण या किसी भी प्रकार के बंधन से रोकने की मांग की। अपीलकर्ता ने मध्यस्थता खंड के आधार पर पक्षों को मध्यस्थता के लिए भेजने का आवेदन दायर किया।
पक्षों की दलीलें:
अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि उत्तरदाताओं ने समझौते का उल्लंघन करते हुए मुकदमा दायर किया, जिससे यह अस्वीकार्य है। उत्तरदाताओं ने दावा किया कि अपीलकर्ता ने लिखित बयान दायर करके अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार किया और मध्यस्थता खंड का त्याग किया।
निचली अदालत का निर्णय:
निचली अदालत ने कहा कि धारा 8 के तहत आवेदन दायर करने से पहले विवाद के विषय पर पहला बयान प्रस्तुत करना आवश्यक है। चूंकि अपीलकर्ता ने आवेदन और लिखित बयान एक साथ दायर किए, इसलिए उसने मध्यस्थता खंड का त्याग किया।
उच्च न्यायालय का निर्णय:
उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि धारा 8 के तहत आवेदन पहले बयान के प्रस्तुत करने से पहले दायर किया जाता है, तो इसे अधिकार क्षेत्र के त्याग के रूप में नहीं माना जा सकता। 'नहीं बाद में' शब्द का उपयोग यह दर्शाता है कि पक्ष को मध्यस्थता के लिए आवेदन जल्द से जल्द करना चाहिए। अदालत ने अपील स्वीकार की और निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए मामले को पुनः विचार के लिए भेजा।
यह निर्णय मध्यस्थता के महत्व को रेखांकित करता है और यह स्पष्ट करता है कि मध्यस्थता खंड का त्याग केवल लिखित बयान के माध्यम से नहीं माना जा सकता, जब तक कि स्पष्ट संकेत न हों। पक्षों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए मध्यस्थता के विकल्प का उपयोग करना चाहिए।