सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: न्यायपालिका ने जाति और धर्म के संबंध पर स्पष्ट किया दृष्टिकोण
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-11-28 21:52:06

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया है कि ईसाई धर्म में जन्मे व्यक्ति जाति के ग्रहण सिद्धांत (Doctrine of Eclipse of Caste) का लाभ नहीं उठा सकते। यह निर्णय जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने दिया। कोर्ट ने कहा कि ईसाई धर्म जाति-आधारित व्यवस्था को मान्यता नहीं देता है, इसलिए इस सिद्धांत का उपयोग केवल उन व्यक्तियों पर होता है जो जाति-आधारित धर्म से किसी जाति-रहित धर्म में परिवर्तित हुए हों।
मामले का संदर्भ: जाति प्रमाण पत्र पर विवाद
यह निर्णय पुडुचेरी में ऊपरी श्रेणी लिपिक (Upper Division Clerk) के पद के लिए आवेदन करने वाली एक महिला की याचिका को खारिज करते हुए दिया गया। महिला ने अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र प्राप्त करने का दावा किया था। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वह एक हिंदू पिता और ईसाई माता से जन्मी है, और बाद में उसका परिवार हिंदू धर्म में पुनः परिवर्तित हो गया।
कोर्ट का अवलोकन: ईसाई धर्म में जाति नहीं होती
खंडपीठ ने कहा कि ईसाई धर्म में जाति की कोई मान्यता नहीं है और इस धर्म में सभी अनुयायियों को समान माना जाता है। इसलिए, इस मामले में ग्रहण सिद्धांत लागू नहीं होता।
ग्रहण सिद्धांत का सार
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में किए गए निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि:
यदि कोई व्यक्ति जाति-आधारित धर्म (जैसे हिंदू धर्म) को छोड़कर जाति-रहित धर्म (जैसे ईसाई धर्म) में परिवर्तित होता है, तो उसकी जाति एक प्रकार से "ग्रहण" में चली जाती है।
यदि वह व्यक्ति जीवनकाल में पुनः अपने मूल धर्म में लौटता है और उसकी जाति उसे स्वीकार करती है, तो जाति स्वाभाविक रूप से पुनर्जीवित हो जाती है।
परंतु यह केवल उन व्यक्तियों पर लागू होता है जो जाति-आधारित धर्म में पैदा हुए थे।
महत्वपूर्ण संदर्भ: ईसाई धर्म और जाति
1968 के मामले S. Rajagopal बनाम C.M. Armugam और 1984 के मामले कैलाश सोनकर बनाम माया देवी में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि:
ईसाई धर्म वैश्विक स्तर पर जाति व्यवस्था या भेदभाव को अस्वीकार करता है।
पुनर्प्रवर्तन के बाद जाति केवल उन्हीं मामलों में बहाल होती है जहां इसे जातीय समुदाय द्वारा मान्यता प्राप्त हो।
महिला की दलील और कोर्ट की प्रतिक्रिया
याचिकाकर्ता ने कहा कि उनकी जाति हिंदू धर्म में जन्म के कारण "ग्रहण" में थी और परिवार के हिंदू धर्म में लौटने के बाद इसे पुनर्जीवित होना चाहिए।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
महिला इस बात का पर्याप्त प्रमाण नहीं दे सकी कि उसने हिंदू धर्म में पुनः परिवर्तन किया है।
धर्मांतरण का कोई सार्वजनिक घोषणा या समारोह (जैसे आर्य समाज द्वारा) नहीं किया गया।
रिकॉर्ड में यह तथ्य सामने आया कि महिला अभी भी ईसाई धर्म का पालन करती है।
न्यायालय का निष्कर्ष
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ईसाई धर्म में जन्मे व्यक्ति पर ग्रहण सिद्धांत लागू नहीं हो सकता। जस्टिस महादेवन ने अपने फैसले में लिखा:
“जाति ग्रहण सिद्धांत उन मामलों में लागू नहीं हो सकता जहां व्यक्ति ईसाई धर्म में पैदा हुआ हो। जाति की पुनर्बहाली केवल उसी स्थिति में होती है जब व्यक्ति हिंदू धर्म में पुनः परिवर्तित हो और जातीय समुदाय उसे स्वीकार करे।”
महत्वपूर्ण संदेश: धर्मांतरण और जाति व्यवस्था
यह निर्णय धर्मांतरण और जाति-आधारित लाभों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल दावे करना पर्याप्त नहीं है; इसे साक्ष्यों से साबित करना अनिवार्य है।