(सख्त टिप्पणी संविधान पर धोखा) धार्मिक परिवर्तन के आधार पर आरक्षण का लाभ: सुप्रीम कोर्ट का सख्त फैसला
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-11-28 21:40:34

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले को बरकरार रखते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें एक महिला ने अनुसूचित जाति (SC) प्रमाण पत्र की मांग की थी। महिला का दावा था कि वह हिंदू है, जबकि वह जन्म से ईसाई थी। कोर्ट ने इसे संविधान और आरक्षण नीति की भावना के खिलाफ बताया।
मामला: अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र का दावा
महिला ने पुदुचेरी में अपर डिवीजन क्लर्क की नौकरी के लिए अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र का दावा किया। उसका तर्क था कि उसके पिता हिंदू थे, और उसकी परवरिश अनुसूचित जाति समुदाय में हुई। महिला ने यह भी कहा कि उसका परिवार वल्लुवन जाति से संबंधित है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि महिला का जन्म ईसाई माता-पिता के घर हुआ था, और उसका 1991 में ईसाई धर्म में बपतिस्मा किया गया। इस आधार पर, उसे अनुसूचित जाति के लाभ देने से इनकार कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: "संविधान पर धोखा"
न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा:
"केवल आरक्षण का लाभ लेने के लिए धर्म परिवर्तन करना संविधान पर धोखा है और आरक्षण नीति की सामाजिक भावना के विपरीत है।"
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति का लाभ केवल उन्हीं को दिया जा सकता है, जो धर्म परिवर्तन के बाद हिंदू धर्म में वापस लौटने और अपनी जाति द्वारा पुनः स्वीकार किए जाने का ठोस प्रमाण प्रस्तुत करें।
तथ्यों की जांच: क्या महिला ने धर्म परिवर्तन किया?
महिला ने दावा किया कि वह हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करती है। लेकिन, गांव प्रशासनिक अधिकारी की रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट ने पाया कि उसका परिवार ईसाई था। महिला का बपतिस्मा 1991 में हुआ था, और उसके भाई का भी दो साल पहले धर्म परिवर्तन हो चुका था।
कोर्ट ने कहा: "ईसाई धर्म अपनाने के बाद व्यक्ति अपनी जाति की पहचान खो देता है। जब तक सार्वजनिक घोषणा, औपचारिक अनुष्ठान, या जाति समुदाय की स्वीकृति न हो, पुनः हिंदू बनने का दावा मान्य नहीं हो सकता।"
आरक्षण नीति का दुरुपयोग: सामाजिक उद्देश्य पर प्रभाव
कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल लाभ प्राप्त करने के लिए धर्म परिवर्तन आरक्षण की सामाजिक भावना को कमजोर करता है।
"धर्म परिवर्तन का उद्देश्य आध्यात्मिक और धार्मिक होना चाहिए, न कि केवल लाभ प्राप्त करने के लिए।"
महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपने फैसले को मजबूत करने के लिए पूर्ववर्ती निर्णयों का उल्लेख किया।
कैलाश सोनकर बनाम माया देवी (1984): धर्म परिवर्तन के बाद जाति एक प्रकार से 'ग्रहण' में चली जाती है। पुनः हिंदू धर्म अपनाने और जाति समुदाय की स्वीकृति के बाद ही वह जाति वापस मानी जाती है।
राजगोपाल बनाम सी.एम. अर्मुगम (1968): ईसाई धर्म में जातिगत पहचान समाप्त हो जाती है।
महिला के दावे का खंडन
महिला ने दावा किया कि वह हिंदू धर्म का पालन करती है, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
"ऐसे किसी प्रमाण का अभाव है जो यह दिखाए कि महिला ने औपचारिक रूप से हिंदू धर्म में वापसी की हो। वह अभी भी ईसाई धर्म का पालन कर रही है।"
न्यायालय का फैसला और याचिका का खारिज होना
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह मामला आरक्षण नीति के उद्देश्यों के विपरीत है।
"ऐसे मामलों में लाभ देना सामाजिक न्याय की भावना को कमजोर करता है।"
वकीलों की भूमिका
याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एस. नप्पिनाई, वकील वी. बालाजी।
प्रतिवादी की ओर से: वकील अरविंद एस., अब्बास बी।
धर्म परिवर्तन और आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
यह फैसला धर्म परिवर्तन के आधार पर आरक्षण का दावा करने वालों के लिए एक कड़ा संदेश है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरक्षण का लाभ केवल उन लोगों को दिया जाना चाहिए, जो वास्तव में अपनी जातिगत पहचान और धर्म से जुड़े हों।