दिल्ली हाई कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय ,क्या कोर्ट में सीधे चुनौती देना है सही रास्ता? दिल्ली हाई कोर्ट का अहम फैसला 


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-11-28 21:32:29



 

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए यह स्पष्ट किया कि मध्यस्थता पुरस्कार (Arbitral Award) को चुनौती देने के लिए सीधे उच्च न्यायालय का रुख करना, बिना वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए, विधायी मंशा के खिलाफ है। यह मामला माइक्रो और स्मॉल एंटरप्राइजेज फैसिलिटेशन काउंसिल (MSFEC) द्वारा जारी किए गए एक मध्यस्थता पुरस्कार से जुड़ा था।

मामला: याचिका में क्या था तर्क?

याचिकाकर्ता ने न्यायालय से अनुरोध किया कि वह MSMED अधिनियम की धारा 19 में दिए गए मध्यस्थता पुरस्कार के खिलाफ अपील करने के लिए 75% राशि जमा करने की अनिवार्यता को हटा दे।

याचिकाकर्ता की मुख्य दलीलें:

धारा 5 के तहत अदालती हस्तक्षेप: याचिकाकर्ता ने दावा किया कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम (A&C Act) की धारा 5 अदालती हस्तक्षेप को प्रतिबंधित नहीं करती, और उच्च न्यायालय अनुच्छेद 227 के तहत अपनी निगरानी शक्ति का उपयोग कर सकता है।

धारा 19 का "भारी बोझ": याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि MSMED अधिनियम की धारा 19 के तहत 75% राशि जमा करने की अनिवार्यता ने उन्हें न्याय पाने से वंचित कर दिया।

अदालत का विश्लेषण: वैधानिक प्रक्रिया को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

न्यायमूर्ति संजीव नरूला की पीठ ने पाया कि A&C अधिनियम एक पूर्ण और स्वायत्त विधि है, जो मध्यस्थता प्रक्रिया और उसके खिलाफ अपील की प्रक्रिया के लिए विस्तृत प्रावधान करती है।

प्रमुख अवलोकन:

न्यायिक हस्तक्षेप को कम करना: A&C अधिनियम की धारा 5 स्पष्ट रूप से न्यायिक हस्तक्षेप को न्यूनतम करने की मंशा रखती है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला:

दीप इंडस्ट्रीज बनाम ओएनजीसी (2019): अनुच्छेद 226 और 227 के तहत हस्तक्षेप केवल दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।

इंडिया ग्लाइकॉल्स लिमिटेड बनाम MSFEC (2023): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि MSMED अधिनियम के तहत मध्यस्थता पुरस्कार को चुनौती देने के लिए याचिका दायर करना अस्वीकार्य है।

धारा 19 का महत्व: अनिवार्य 75% जमा

अदालत ने यह भी कहा कि धारा 19 के तहत 75% राशि जमा करने की आवश्यकता विधायी उद्देश्य को मजबूत करती है। यह आवश्यकता विशेष रूप से:

फ्रिवोलस चुनौतियों को रोकने के लिए:

MSME को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए याचिकाकर्ता के आर्थिक कठिनाई के तर्क को खारिज किया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल वित्तीय असुविधा या कठिनाई के आधार पर वैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

धारा 34 और अनुच्छेद 226 में अंतर

अनुच्छेद 226:

इसके तहत दी गई शक्तियां अत्यंत सीमित हैं और इसका उपयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में किया जा सकता है।

धारा 34:

मध्यस्थता अधिनियम के तहत, इस प्रक्रिया में उन सभी आधारों को चुनौती दी जा सकती है जो वैध और औचित्यपूर्ण हैं।

याचिका खारिज: फैसले का प्रभाव

अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए यह दोहराया कि किसी भी कानूनी चुनौती को उठाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।

"मध्यस्थता पुरस्कार के खिलाफ अपील के लिए पहले 75% राशि जमा करना एक वैधानिक शर्त है। इसे नजरअंदाज करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।"

फैसले के प्रमुख पक्षकार

याचिकाकर्ता के लिए: वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एस. नप्पिनाई, वकील वी. बालाजी।

प्रतिवादी के लिए: वकील अरविंद एस।

MSME के लिए एक सशक्त कदम

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला MSME के हितों की सुरक्षा के लिए एक सशक्त कदम है। यह सुनिश्चित करता है कि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो और MSMED अधिनियम की मंशा के अनुसार समय पर भुगतान सुनिश्चित हो।


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