(कायदा, कानून, नियम) 498A के मामलों में दूर के रिश्तेदारों को फंसाने पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी: जानिए पूरा मामला
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-11-28 09:10:48

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में अदालतों को चेतावनी दी है कि वे पतियों के दूर के रिश्तेदारों को घरेलू हिंसा के मामलों में बेवजह अभियुक्त न बनने दें। यह फैसला जस्टिस सी.टी. रविकुमार और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए दिया।
मामले का संदर्भ: दूर के रिश्तेदारों पर आरोप
इस मामले में शिकायतकर्ता (पत्नी के पिता) ने अपने दामाद के चचेरे भाई और उसकी पत्नी पर दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का आरोप लगाया था। एफआईआर तब दर्ज हुई जब पति ने पत्नी के खिलाफ तलाक की याचिका दायर की। यह आरोप लगाया गया कि दामाद के परिवार ने शादी के तुरंत बाद दहेज के लिए दबाव डाला।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार: "अधिकांश आरोप बढ़ा-चढ़ाकर होते हैं"
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का यह दायित्व था कि वह यह जांचे कि शिकायत में रिश्तेदारों को फंसाना एक "अत्यधिक आरोप" है या नहीं। कोर्ट ने Preeti Gupta & Anr बनाम State of Jharkhand (2010) मामले का हवाला देते हुए कहा:
"आरोपितों को आपराधिक मुकदमे झेलने से बड़ी मानसिक पीड़ा और सामाजिक कलंक सहना पड़ता है, भले ही वे मुकदमे में अंततः निर्दोष साबित हों।"
'रिश्तेदार' की परिभाषा पर अदालत की व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आईपीसी की धारा 498A में "रिश्तेदार" की परिभाषा स्पष्ट नहीं है। इसे सामान्य रूप से रक्त संबंध, विवाह, या गोद लेने से जुड़े रिश्तों के रूप में समझा जा सकता है, जैसे माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी, और उनके बच्चे। हालांकि, जो व्यक्ति शिकायतकर्ता के साथ खून, विवाह या गोद लेने से संबंधित नहीं है, उस पर लगाए गए आरोपों को अदालतों द्वारा विशेष ध्यान से जांचा जाना चाहिए।
भौगोलिक दूरी और आरोपों की सच्चाई
इस मामले में अभियुक्त चचेरे भाई और उसकी पत्नी मोहाली में रहते थे, जबकि शिकायतकर्ता की बेटी जालंधर में। अदालत ने पाया कि यह स्पष्ट रूप से मामला था, जिसमें दूर के रिश्तेदारों को मुख्य अभियुक्त पर दबाव बनाने के लिए शामिल किया गया था। "यदि आरोपी एक अलग स्थान पर रहता है, तो अदालतों को यह जांचना चाहिए कि क्या ऐसे आरोप केवल दबाव डालने के लिए लगाए गए हैं," सुप्रीम कोर्ट ने कहा।
आरोपों का प्रकृति: सामान्य और सर्वव्यापी
कोर्ट ने कहा कि आरोप सामान्य और अस्पष्ट थे। शिकायत में कोई ठोस साक्ष्य नहीं था जो इन दूर के रिश्तेदारों के अपराध में सीधे तौर पर शामिल होने को दर्शाता हो। "इन आरोपों पर अभियुक्तों को अदालत का सामना करने देना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।"
निचली अदालत के निर्णय की आलोचना
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था क्योंकि अंतिम रिपोर्ट पहले ही दाखिल हो चुकी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को खारिज कर दिया और कहा कि रिपोर्ट दाखिल होना हस्तक्षेप न करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता।
प्रमुख मामलों का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण निर्णयों का संदर्भ दिया, जैसे:
Preeti Gupta & Anr बनाम State of Jharkhand (2010)
Geeta Mehrotra & Anr बनाम State of U.P. (2012)
इन मामलों में अदालत ने स्पष्ट किया था कि घरेलू विवादों में पूरे परिवार को घसीटने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।
वकीलों की भूमिका
अभियुक्तों की ओर से: अजय चौधरी और विनीता भगत
प्रत्युत्तर पक्ष की ओर से: करन शर्मा
रिश्तेदारों को फंसाने की प्रवृत्ति पर लगाम
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह सुनिश्चित किया कि दूर के रिश्तेदारों को केवल परिवार पर दबाव डालने के लिए बेवजह कानूनी लड़ाई में न घसीटा जाए। यह निर्णय घरेलू हिंसा के मामलों में आरोपों की सत्यता की जांच के महत्व को रेखांकित करता है।