सिविल सेवा में लेट्रल एंट्री विवाद: विवादित पहलू और राजनीतिक बहस -अजय त्यागी
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-11-28 09:00:26

सिविल सेवाओं में 'लेट्रल एंट्री' का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। इस प्रक्रिया के जरिए निजी क्षेत्र या अन्य गैर-सरकारी संगठनों के विशेषज्ञों को सरकारी पदों पर नियुक्त किया जाता है। हालांकि, हाल ही में लोकसभा सचिवालय ने पुष्टि की कि इस विवादित विषय को 2024-25 सत्र में संसदीय स्थायी समिति द्वारा जांचा जाएगा। विवाद का मुख्य कारण यह है कि यह प्रक्रिया आरक्षण व्यवस्था को दरकिनार करती है, जिससे दलित, आदिवासी, और पिछड़े वर्गों के हित प्रभावित होते हैं।
क्या है लेटरल एंट्री?
'लेट्रल एंट्री' का उद्देश्य सरकार में विशेषज्ञता और नवाचार लाना है। यह प्रक्रिया परंपरागत यूपीएससी परीक्षाओं और पदोन्नति के बजाय सीधे भर्ती के जरिए होती है। विशेषज्ञों को मंत्रालयों में संयुक्त सचिव, निदेशक, या उप सचिव के स्तर पर नियुक्त किया जाता है। सरकार ने इस प्रक्रिया को 2018 में लागू किया था और वर्तमान में 57 अधिकारी इस माध्यम से सेवा में हैं।
विवाद की जड़ और सरकारी कदम
अगस्त 2024 में यूपीएससी द्वारा लेटरल एंट्री के तहत 45 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया गया। विपक्षी दलों और आरक्षण समर्थक समूहों ने इसका विरोध किया, इसे सामाजिक न्याय के खिलाफ बताते हुए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित अन्य विपक्षी नेताओं ने दावा किया कि यह कदम संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के बाद सरकार ने इस विज्ञापन को रद्द कर दिया और आरक्षण नीति की समीक्षा की बात कही।
लेटरल एंट्री के फायदे और नुकसान
यह प्रक्रिया विशेषज्ञता लाने और नौकरशाही को कुशल बनाने के उद्देश्य से शुरू हुई थी। इसके समर्थक इसे नीति-निर्माण में गुणवत्ता सुधारने वाला कदम मानते हैं। लेकिन इसके विरोधी इसे पारंपरिक सिविल सेवाओं की निष्पक्षता और आरक्षण के अधिकारों पर चोट पहुंचाने वाला बताते हैं। आलोचकों का यह भी कहना है कि इससे नौकरशाही में अंदरूनी संघर्ष बढ़ सकता है।
कई आशंकाओं का जन्म
इस विवाद ने आम जन के दिलो-दिमाग में कई आशंकाओं को जन्म दिया है। ऐसी आशंका है कि लेटरल एंट्री ने ना सिर्फ भ्रष्टाचार के लिए नए रास्ते खोलने का काम किया है बल्कि कहीं ना कहीं किसी जायज और होनहार प्रतिभा का शोषण किया है जो उस पद के लिए जायज हक़दार थी। बहुत हद तक मुमकिन है कि राजनीतिक नियुक्तियों की तरह यहाँ भी केवल अपने चहेतों को ही रेवड़िया बांटी जाती हैं। जहाँ एक क्लर्क की नौकरी के लिए इतनी प्रतिस्पर्धा है ऐसे में सिवेल सेवा में लेटरल एंट्री कहीं ना कहीं इस बात की ओर भी इशारा करती है कि बिना परीक्षा और प्रतिस्पर्धा के केवल अयोग्य लोग ही इसके लिए पात्र बनाए जाते हैं। जिनकी योग्यता मात्र इतनी होती है कि वह रसूकदारों के परिजन अथवा रिश्तेदार हैं।
क्या आगे की राह सुझाई गई है?
संसदीय पैनल की जांच के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि सरकार इस प्रक्रिया को कैसे संतुलित करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रक्रिया को आरक्षण व्यवस्था के तहत लाना ही विवाद को सुलझाने का तरीका हो सकता है। जबकि इसे समाप्त करके प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से योग्य प्रतिभा को स्थान देना ही इसका श्रेष्ठ एवं दूरगामी परिणाम परिलक्षित होता है - अजय त्यागी