VIP वर्गों को जमीन आवंटन नीति असंवैधानिक, पत्रकारों को अलग श्रेणी में शामिल करना अनुचित -सुप्रीम कोर्ट 


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-11-28 08:46:50



 

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में सांसदों, विधायकों, अधिकारियों, न्यायाधीशों और पत्रकारों जैसे विशिष्ट वर्गों को हैदराबाद नगर निगम क्षेत्र में रियायती दरों पर भूमि आवंटन को असंवैधानिक करार दिया। इस फैसले ने सरकार की इस नीति पर सवाल खड़े किए हैं, जो समानता के संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन करती थी।

भूमि आवंटन नीति पर सवाल:

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने आंध्र प्रदेश सरकार के 2005 और 2008 के आदेशों को रद्द कर दिया। इन आदेशों में सांसदों, विधायकों, अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों, न्यायाधीशों और पत्रकारों को एक अलग वर्ग मानते हुए उन्हें रियायती दरों पर जमीन दी गई थी। कोर्ट ने इसे मनमाना और असंवैधानिक बताते हुए कहा कि यह नीति समाज में असमानता को बढ़ावा देती है और संवैधानिक समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है​।

समानता और न्याय का मुद्दा:

न्यायमूर्ति खन्ना ने अपने निर्णय में लिखा कि भूमि जैसी महत्वपूर्ण संसाधन का उपयोग केवल कुछ वर्गों के फायदे के लिए करना न केवल अनुचित है बल्कि यह साधारण नागरिकों के बीच असंतोष पैदा करता है। यह नीति समाज में भाईचारे और एकजुटता को कमजोर करती है और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग को अनुचित लाभ देती है​।

पत्रकारों को अलग श्रेणी में शामिल करना अनुचित:

कोर्ट ने यह भी माना कि पत्रकारों को ऐसी रियायतें देना अनुचित है। न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और पत्रकारिता को लोकतंत्र के चार स्तंभ माना जाता है। लेकिन इन स्तंभों को लाभ पहुंचाने वाली नीतियां लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर करती हैं​।

सरकार की जिम्मेदारी:

कोर्ट ने कहा कि राज्य को समाज के कमजोर वर्गों की मदद करने का अधिकार है, लेकिन इस प्रक्रिया में उसे संवैधानिक प्रावधानों का पालन करना होगा। किसी भी नीति को अनुच्छेद 14 के तहत समानता और निष्पक्षता के मानकों पर खरा उतरना चाहिए। विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों को अनुचित लाभ देना राज्य के संसाधनों के प्रबंधन की मूल भावना के खिलाफ है​।

फैसले के परिणाम:

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि जिन लोगों को जमीन आवंटित की गई थी, उन्हें उनके द्वारा जमा की गई धनराशि, स्टाम्प शुल्क और पंजीकरण शुल्क ब्याज सहित वापस किया जाए। राज्य सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह इन जमीनों का उपयोग अपने विवेक और कानून के अनुसार करे​।


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