(चुनौती खारिज देखते रहिए बीकानेर फ्रंटियर) संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्दों पर सुप्रीम फैसला: 44 साल बाद चुनौती खारिज


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-11-28 08:13:29



 

सुप्रीम कोर्ट ने 25 नवंबर को संविधान की प्रस्तावना में 1976 में शामिल किए गए "समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष" शब्दों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने स्पष्ट किया कि इतने वर्षों बाद इस मुद्दे को उठाने का कोई वैध कारण नहीं है।

42वें संशोधन की पृष्ठभूमि

1976 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा आपातकाल के दौरान 42वां संशोधन पारित किया गया था, जिसके तहत संविधान की प्रस्तावना में "समाजवादी", "धर्मनिरपेक्ष" और "अखंडता" जैसे शब्द जोड़े गए। इस संशोधन ने उस समय भी तीखी बहस को जन्म दिया था, लेकिन इसे संविधान के मौलिक ढांचे के अनुरूप माना गया। हालांकि, 1978 में हुए 44वें संशोधन के बावजूद इन शब्दों को प्रस्तावना से नहीं हटाया गया।

याचिका क्यों हुई खारिज?

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि संसद की संशोधन शक्ति प्रस्तावना तक भी विस्तारित होती है। न्यायालय ने कहा कि संविधान का 1949 में अंगीकरण, संसद को प्रस्तावना में संशोधन करने से नहीं रोकता।

मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, "समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष" शब्दों का उपयोग भारतीय संदर्भ में है। "समाजवाद" का अर्थ है "कल्याणकारी राज्य" और "धर्मनिरपेक्षता" का अर्थ सभी धर्मों को समान अधिकार और अवसर देना है। यह संविधान के मौलिक ढांचे का हिस्सा है, जैसा कि एस.आर. बोम्मई मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया था।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें

याचिकाकर्ताओं में डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी, अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय और विष्णु शंकर जैन शामिल थे। इन्होंने यह तर्क दिया कि 42वें संशोधन को आपातकाल के दौरान लागू किया गया था, जब लोकतंत्र दबाव में था। उन्होंने इसे लोगों की सहमति के बिना थोपा गया संशोधन करार दिया।

मुख्य न्यायाधीश ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि इतने वर्षों बाद इस संशोधन को चुनौती देना अनुचित है। संविधान के मूलभूत अधिकारों और ढांचे को बनाए रखते हुए, "समाजवाद" और "धर्मनिरपेक्षता" ने किसी भी कानून या नीति को बाधित नहीं किया।

न्यायालय का दृष्टिकोण

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि "समाजवाद" का भारतीय संदर्भ अन्य देशों से भिन्न है। भारत में इसे निजी क्षेत्र के विकास को रोकने वाला नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने वाला समझा जाता है। उन्होंने कहा कि 44 वर्षों के बाद इस संशोधन पर सवाल उठाना न्यायिक समय की बर्बादी है।

बहरहाल, यह फैसला भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 1976 में किए गए बदलावों को न्यायिक वैधता प्रदान करता है। अदालत ने कहा कि "समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष" शब्द, भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों के साथ मेल खाते हैं और इन्हें चुनौती देना अब तार्किक नहीं है।


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