(अब अल सवेरे बात कानून और अपराध की) केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पुलिस अधिकारी पर प्रतिकूल टिप्पणी को हटाने का आवेदन अस्वीकार


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-11-28 05:58:43



 

केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने की याचिका को खारिज कर दिया। यह निर्णय विशेष न्यायालय के आदेश से संबंधित था, जिसमें पुलिस अधिकारी के खिलाफ कुछ गंभीर आरोप लगाए गए थे। इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया कि अदालत में विचाराधीन मामलों में अधिकारियों के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करना कभी-कभी आवश्यक होता है, खासकर जब यह न्यायिक निर्णय का हिस्सा हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला उस समय सामने आया जब एक विशेष फास्ट ट्रैक अदालत ने एक आरोपी की डिस्चार्ज याचिका पर सुनवाई की। आरोपी पर भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत कई गंभीर आरोप थे, जिनमें आपराधिक बलात्कार (धारा 354C), और बाल यौन शोषण रोकथाम अधिनियम (POCSO) की धाराएं शामिल थीं। अदालत ने आरोपी को कुछ आरोपों से मुक्त कर दिया, लेकिन इस प्रक्रिया में यह पाया कि आरोपी को पुलिस द्वारा बिना किसी वैध कारण के जल्द ही छोड़ दिया गया था, और उसका मोबाइल फोन 15 दिन बाद, जब सबूत नष्ट हो चुका था, पुलिस के पास वापस किया गया था।

पुलिस अधिकारी पर टिप्पणी

विशेष अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई की आवश्यकता है। विशेष रूप से, यह पाया गया कि आरोपी का मोबाइल फोन समय पर फोरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा जा सका, जिससे महत्वपूर्ण सबूतों का नुकसान हुआ। अदालत ने इस पर टिप्पणी की और मणिमाला पुलिस स्टेशन के सर्कल इंस्पेक्टर के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की। इसके बाद, उस पुलिस अधिकारी ने केरल हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अदालत के आदेश में की गई टिप्पणी को हटाने की मांग की।

केरल हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि न्यायिक निर्णय में की गई यह टिप्पणी आवश्यक थी। न्यायमूर्ति ए. बादरुद्दीन ने कहा कि जब अदालत निर्णय ले रही थी, तब इस टिप्पणी का होना अनिवार्य था और इसे हटाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में यह संभव नहीं था कि अधिकारी को पहले सुना जाता, क्योंकि यह टिप्पणी सीधे मामले के निर्णय से जुड़ी हुई थी।

न्यायिक प्रक्रिया की अहमियत

हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में अधिकारियों को प्रतिकूल टिप्पणियों से बचाने की आवश्यकता नहीं होती, जब तक यह टिप्पणी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हो। अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारी के खिलाफ कोई व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की गई थी, बल्कि यह टिप्पणी उनकी कार्यवाही से संबंधित थी। अदालत ने यह भी कहा कि अगर अधिकारी को कोई आरोप था, तो उसे विभागीय जांच में पूरी तरह से सुना जाएगा।

यह मामला दर्शाता है कि न्यायिक प्रक्रिया में कभी-कभी अधिकारियों के खिलाफ की गई टिप्पणियां आवश्यक हो सकती हैं, खासकर जब यह न्यायपूर्ण निर्णय लेने के लिए आवश्यक हों। हाईकोर्ट ने यह भी साबित किया कि न्यायिक टिप्पणियों को सिर्फ इसलिए हटाना उचित नहीं है क्योंकि किसी को उनकी आलोचना झेलनी पड़ी हो।


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