ब्रिटिश कालीन पुल गिरा: 150 साल की धरोहर ने ली विदाई
2024-11-27 18:06:35

गंगा नदी पर बना 150 साल पुराना ब्रिटिश युग का पुल मंगलवार को कानपुर और शुक्लागंज के बीच ढह गया। सौभाग्य से, इस घटना में कोई जनहानि नहीं हुई क्योंकि पुल को तीन साल पहले ही जनता के लिए बंद कर दिया गया था। यह पुल केवल एक यातायात का साधन नहीं, बल्कि ऐतिहासिक धरोहर थी जिसने स्थानीय जनता को भावनात्मक रूप से जोड़ रखा था।
पुल का इतिहास और निर्माण
1870 के दशक में अवध और रोहिलखंड कंपनी लिमिटेड द्वारा निर्मित यह पुल तत्कालीन तकनीकी और डिजाइन का उत्कृष्ट उदाहरण था। इसे इंजीनियर जे.एम. हेपोल की देखरेख में डिज़ाइन किया गया था, जबकि निर्माण कार्य एस.बी. न्यूटन और ई. वेडगार्ड ने पूरा किया। इस दो-मंजिला पुल के ऊपरी हिस्से में नैरो गेज रेलवे लाइन थी और निचला हिस्सा वाहनों व पैदल यात्रियों के लिए आरक्षित था।
1875 में इसे जनता के लिए खोला गया, और अगले ही दिन रेलवे यातायात शुरू हुआ। करीब 800 मीटर लंबा यह पुल व्यापार और यातायात के लिए उस समय क्रांतिकारी था।
पुल की मौजूदा स्थिति और गिरावट के कारण
पुरानी संरचना और रखरखाव की कमी के कारण पुल की हालत जर्जर हो गई थी। विशेषज्ञों की जांच रिपोर्ट ने चेतावनी दी थी कि पुल की दीर्घकालिक क्षमता खत्म हो चुकी है। इसकी प्रमुख पिलरों और गर्डरों में गंभीर दरारें पाई गई थीं, जिससे पुल को बंद करने का निर्णय लिया गया।
केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRI) की एक रिपोर्ट ने संकेत दिया था कि उचित मरम्मत के बाद पुल को 50 और वर्षों तक उपयोग में लाया जा सकता था। परंतु समय और संसाधनों की कमी के कारण इसे सुरक्षित बनाए रखने का काम अधूरा रह गया।
स्थानीय निवासियों के लिए पुल का महत्व
यह पुल स्थानीय निवासियों के लिए केवल एक यातायात मार्ग नहीं था, बल्कि यह उनकी भावनाओं से जुड़ा हुआ था। इसके ऐतिहासिक महत्व और फिल्म शूटिंग जैसी गतिविधियों ने इसे और भी खास बनाया था। इसके ढहने से लोग भावुक हो गए, और उनके मन में एक युग का अंत होने जैसा अनुभव हुआ।
सरकारी प्रयास और भविष्य की योजना
2018 में, पुल को भारी वाहनों के लिए बंद कर दिया गया था। 2021 में इसे पूरी तरह यातायात से हटा दिया गया। पुल की मरम्मत और उपयोगिता को लेकर आईआईटी कानपुर और CRRI से तकनीकी अध्ययन का प्रस्ताव भी पेश किया गया था। हालाँकि, मरम्मत के लिए कोई ठोस योजना लागू नहीं हो पाई। अब इस पुल का इतिहास केवल पुस्तकों और तस्वीरों तक सीमित हो जाएगा।
यह घटना भारत की ऐतिहासिक धरोहरों की उपेक्षा का उदाहरण है। समय रहते यदि ऐसे धरोहरों का संरक्षण किया जाए तो वे आने वाली पीढ़ियों के लिए गौरवशाली प्रतीक बन सकते हैं।