निर्माण कार्य के दौरान हुई मौत पर मुआवजा: इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला


के कुमार आहूजा  2024-11-26 05:42:37



 

 

♦ एक दर्दनाक घटना, एक श्रमिक का परिवार और न्याय का संघर्ष। 

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 के तहत एक निर्माण श्रमिक की मौत पर बड़ा फैसला सुनाया, जो हर श्रमिक और उनके परिवार के अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण है।

घटना का विवरण

मामला उत्तर प्रदेश का है, जहां दीवार पेंटिंग और मरम्मत कार्य के दौरान तीसरी मंजिल से गिरने के कारण एक मजदूर की मृत्यु हो गई। मृतक की पत्नी ने अपने पति के नियोक्ता और भवन मालिक से मुआवजा मांगते हुए कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 की धारा 3 के तहत केस दर्ज किया था।

हालांकि, मुआवजा आयुक्त ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि मृतक और नियोक्ता के बीच कोई स्पष्ट "मालिक-कर्मचारी" संबंध नहीं था।

परिवार का संघर्ष और अपील

मृतक की पत्नी ने आयुक्त के फैसले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि मरम्मत और पेंटिंग कार्य के लिए उनके पति को नियोक्ता द्वारा रखा गया था। कोर्ट ने उनके तर्कों को मान्यता दी और आयुक्त के आदेश को गलत ठहराया।

कानूनी प्रावधान और कोर्ट का निर्णय

हाई कोर्ट ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 के सेक्शन 2(dd) और अनुसूची II पर ध्यान केंद्रित किया, जो "कर्मचारी" की परिभाषा और उनकी जिम्मेदारियों को स्पष्ट करती है।

न्यायमूर्ति विपिन चंद्र दीक्षित ने अपने फैसले में कहा कि "किसी भी व्यक्ति को जो दो या अधिक मंजिल ऊंची इमारत के निर्माण, मरम्मत या विध्वंस में लगाया गया है, कर्मचारी माना जाएगा।" कोर्ट ने मृतक को अधिनियम के तहत "कर्मचारी" घोषित करते हुए परिवार के मुआवजे के अधिकार को स्वीकार किया।

सामाजिक और कानूनी प्रभाव

यह निर्णय श्रमिकों के अधिकारों और सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। कोर्ट ने कहा कि मालिक और ठेकेदार दोनों पर श्रमिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है। यह फैसला मजदूर वर्ग के अधिकारों की जीत है और श्रमिक सुरक्षा में लापरवाही को उजागर करता है।


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