झारखंड हाईकोर्ट ने खारिज किया कोयला विवाद पर ट्रिब्यूनल का आदेश: जानें पूरा मामला


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-11-26 05:14:30



 

झारखंड हाईकोर्ट ने हाल ही में अदानी एंटरप्राइजेज और भारत सरकार के बीच गोंडुलपारा कोयला ब्लॉक विवाद पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अपनी पर्यवेक्षी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कोल बेयरिंग ट्रिब्यूनल के आदेश को खारिज कर दिया। यह मामला न केवल न्यायिक प्रक्रिया पर रोशनी डालता है बल्कि उद्योग जगत में भी चर्चा का विषय बन गया है।

मामले की पृष्ठभूमि

गोंडुलपारा कोयला ब्लॉक झारखंड के हजारीबाग जिले में स्थित है। 2020 में हुई ई-नीलामी प्रक्रिया में अदानी एंटरप्राइजेज ने इस ब्लॉक पर सबसे ऊंची बोली लगाई थी। इसके तहत कंपनी को कोयला खनन और उत्पादन के अधिकार मिले थे। हालांकि, कंपनी पर आरोप है कि वह समय पर खनन योजना को मंजूरी दिलाने में विफल रही, जिससे परियोजना में देरी हुई। इसके चलते सरकारी समिति ने कंपनी पर प्रदर्शन बैंक गारंटी (PBG) जब्त करने की सिफारिश की थी​।

कोयला ट्रिब्यूनल का आदेश और विवाद

अदानी एंटरप्राइजेज ने कोयला खदान (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2015 की धारा 27(i) के तहत एक याचिका दायर की। इसमें सरकारी कार्रवाई को रोकने की मांग की गई। कोल बेयरिंग ट्रिब्यूनल ने इस पर सुनवाई करते हुए 3 अगस्त 2024 को यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। हालांकि, यह आदेश भारत सरकार की बिना सुनवाई के पारित किया गया, जिसे सरकार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी​।

हाईकोर्ट का निर्णय

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 227 का उपयोग केवल तब किया जा सकता है जब निचली अदालत या ट्रिब्यूनल अपनी अधिकार सीमा से बाहर जाए। हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने भारत सरकार को सुने बिना ही यथास्थिति का आदेश पारित कर दिया, जो न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन है। कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द करते हुए मामले को फिर से सुनवाई के लिए वापस भेजा​।

अनुच्छेद 227 की व्याख्या

हाईकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 227 केवल पर्यवेक्षी शक्ति प्रदान करता है, न कि निचली अदालतों की त्रुटियों को सुधारने का माध्यम। इस शक्ति का उपयोग तभी उचित है जब न्यायिक प्रक्रिया में गंभीर अन्याय हो रहा हो या अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन हो रहा हो। इस मामले में हाईकोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने के आदेश को अस्वीकार किया क्योंकि यह प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण थी​।

आगे की कार्रवाई

हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया कि वह तीन सप्ताह के भीतर सभी पक्षों को सुनवाई का उचित मौका देकर एक नया आदेश जारी करे। इस फैसले ने न्यायिक प्रक्रिया और अनुच्छेद 227 के दायरे को लेकर एक मिसाल स्थापित की है।


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