(गवाहों के बयानात सबूत को मध्य नजर रखते हुए) समयसीमा निकलने के बावजूद मृतक कांस्टेबल के बेटे को सहानुभूतिपूर्ण नियुक्ति का आदेश
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-11-25 22:33:15

पटना हाई कोर्ट के दो सदस्यीय पीठ ने एक विवादित मामले में सहानुभूतिपूर्ण नियुक्ति के आवेदन को स्वीकार किया, जिसमें पहले सिंगल बेंच ने आवेदन को देरी के आधार पर खारिज कर दिया था। यह मामला कांस्टेबल सत्येंद्र सिंह से जुड़ा है, जिन्हें अनुशासनहीनता और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार के आरोप में 2004 में सेवा से बर्खास्त किया गया था। छह महीने बाद उनकी मृत्यु हो गई, और उनकी पत्नी द्वारा दायर की गई अपील को भी खारिज कर दिया गया था।
क्या था मामला?
सत्येंद्र सिंह की पत्नी ने 2006 में बर्खास्तगी आदेश के खिलाफ अपील दायर की थी, जिसे डीआईजी और डीजी-आईजी ने खारिज कर दिया। हालांकि, 2011 में अदालत ने बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया, जिसके बाद उनकी पत्नी ने अपने बेटे के लिए सहानुभूतिपूर्ण नियुक्ति का आवेदन किया। यह आवेदन सिंगल जज द्वारा इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि आवेदन उनकी मृत्यु के पांच वर्षों के भीतर नहीं किया गया था।
अदालत की टिप्पणी
पीठ ने पाया कि सहानुभूतिपूर्ण नियुक्ति के लिए समयसीमा का निर्धारण बर्खास्तगी के आदेश रद्द होने की तारीख (26 अप्रैल 2011) से किया जाना चाहिए, न कि सत्येंद्र सिंह की मृत्यु से। इसके अतिरिक्त, अदालत ने सिंगल बेंच द्वारा तथ्यों को अनदेखा करने पर असंतोष व्यक्त किया।
फैसला
अदालत ने स्पष्ट किया कि आवेदन की देरी तकनीकी मुद्दा था और सहानुभूतिपूर्ण आधार पर आवेदन को 2011 के बाद स्वीकार किया जाना चाहिए। अदालत ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि तीन महीने के भीतर इस पर पुनर्विचार कर एक विस्तृत आदेश पारित करें।
महत्वपूर्ण तथ्यों पर चर्चा
♦ सत्येंद्र सिंह का बर्खास्तगी आदेश: उन्हें अनुशासनहीनता और नशे की स्थिति में गोली चलाने के आरोप में 2004 में सेवा से बर्खास्त किया गया था।
♦ अदालत का हस्तक्षेप: पटना हाई कोर्ट ने 2011 में बर्खास्तगी को रद्द किया, लेकिन परिवार को तुरंत सहानुभूतिपूर्ण नियुक्ति का लाभ नहीं मिला।
♦ सहानुभूतिपूर्ण नियुक्ति के नियम: सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, यह नियुक्ति एक संवैधानिक अपवाद है और तकनीकी मुद्दों के आधार पर इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
यह निर्णय न केवल सहानुभूतिपूर्ण नियुक्ति से जुड़े तकनीकी पहलुओं को स्पष्ट करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि संवेदनशील मामलों में समयसीमा के नियमों को लचीलापन दिया जाना चाहिए। यह फैसला उन परिवारों के लिए राहत प्रदान करता है जो अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।