केरल हाईकोर्ट: यौन मंशा के साथ शारीरिक संपर्क को माना यौन उत्पीड़न
के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा 2024-11-24 06:07:35

केरल हाईकोर्ट: यौन मंशा के साथ शारीरिक संपर्क को माना यौन उत्पीड़न
हाल ही में, केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी भी शारीरिक संपर्क जो ‘यौन मंशा’ के साथ हो, को यौन उत्पीड़न माना जाएगा, भले ही उसमें प्रवेश (penetration) न हो। यह फैसला पोक्सो (POCSO) अधिनियम की धारा 7 की व्याख्या के तहत सुनाया गया, जिसमें यौन उत्पीड़न की परिभाषा विस्तृत रूप से दी गई है।
क्या है मामला?
यह केस एक शिक्षक से जुड़ा है, जिसने प्रथम कक्षा के छात्र को स्टाफ रूम में बुलाकर अपने शरीर पर लेटने के लिए मजबूर किया। बच्चे ने इंकार करने पर बेंत से पीटे जाने का आरोप लगाया। इस डर से बच्चे ने बार-बार उसकी मांग को मानने की कोशिश की। आरोपी शिक्षक पर पोक्सो अधिनियम की धारा 9(f), (m) (गंभीर यौन उत्पीड़न) और धारा 10 (गंभीर यौन उत्पीड़न के लिए सजा) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
हाईकोर्ट का फैसला
न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने कहा कि यौन मंशा के साथ किया गया कोई भी शारीरिक संपर्क यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पोक्सो अधिनियम के तहत अपराध का निर्धारण करते समय अदालत आरोपी की मानसिक स्थिति को भी ध्यान में रख सकती है। न्यायालय ने आरोपी की याचिका को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया, जिसमें आरोपी को आरोप मुक्त करने से इनकार किया गया था।
पोक्सो अधिनियम की भूमिका
पोक्सो अधिनियम बच्चों के यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया एक सख्त कानून है। इसकी धारा 7 के तहत यौन उत्पीड़न में किसी भी प्रकार का शारीरिक संपर्क शामिल है, यदि वह यौन मंशा से किया गया हो। न्यायालय ने कहा कि यह कानून बच्चों के अधिकारों की रक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसके प्रावधानों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए।
फैसले का महत्व
यह फैसला न केवल पोक्सो अधिनियम के प्रावधानों को स्पष्ट करता है, बल्कि यौन अपराधों के मामलों में अदालतों और जांच एजेंसियों को सतर्क रहने का संदेश भी देता है। अदालत ने कहा कि आरोपों की गहराई से जांच होनी चाहिए ताकि निर्दोष लोगों को झूठे आरोपों से बचाया जा सके।
कानूनी टीम
आरोपी की ओर से प्रजित रत्नाकरन, अब्दुल रऊफ पल्लीपाथ और राजेश वी. नायर सहित अन्य वकीलों ने पैरवी की। राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ सरकारी वकील रंजीत जॉर्ज ने केस प्रस्तुत किया।
यह निर्णय भविष्य में पोक्सो अधिनियम के तहत मामलों की सुनवाई में एक नजीर बन सकता है और कानून के दायरे में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मददगार होगा।