राजस्थान हाईकोर्ट ने 38 साल के सेवाकाल के बाद कॉन्स्टेबल को नौकरी से निकाले जाने की सजा को किया रद्द
के कुमार आहूजा 2024-11-23 22:52:53

राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया, जिसमें एक कॉन्स्टेबल की नौकरी से निकाले जाने की सजा को रद्द कर दिया। इस कॉन्स्टेबल (याचिकाकर्ता) पर आरोप था कि उसने नौकरी में प्रवेश के समय एक जाली मार्कशीट प्रस्तुत की थी। हालांकि, न्यायालय ने यह माना कि याचिकाकर्ता के 38 साल के सेवा रिकॉर्ड को देखते हुए यह सजा अनुचित और असंगत थी।
सजा की समीक्षा: क्या यह उचित था?
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विनीत कुमार माथुर की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। याचिकाकर्ता ने 1982 में कॉन्स्टेबल के तौर पर सेवा शुरू की थी और 2013 में उसके खिलाफ एक आरोप पत्र जारी किया गया, जिसमें यह आरोप था कि उसने सेवा में प्रवेश करते समय एक जाली मार्कशीट प्रस्तुत की थी। इसके बाद, 2020 में उसे सेवा से निकाले जाने और उसकी पेंशन व भत्तों की वसूली के आदेश दिए गए थे। याचिकाकर्ता ने इस सजा को असंगत और अत्यधिक बताया, क्योंकि 38 साल की सेवा में उसे कभी कोई दंड नहीं मिला था।
कोर्ट का निर्णय: सजा को असंगत बताया
न्यायालय ने याचिकाकर्ता के तर्कों को स्वीकार किया और कहा कि इतने लंबे समय तक बेदाग सेवा देने वाले कर्मचारी के खिलाफ यह सजा अत्यधिक थी। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि जाली मार्कशीट का आरोप निश्चित रूप से एक गंभीर मामला है, लेकिन 38 वर्षों की सेवा में एक भी दोष नहीं होने के कारण यह सजा अनुपातिक नहीं थी।
कोर्ट ने क्या किया?
न्यायालय ने सरकारी आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को नौकरी से निकाले जाने की सजा को वापस लिया। हालांकि, न्यायालय ने यह आदेश जारी किया कि याचिकाकर्ता को उसके वास्तविक सेवानिवृत्ति के बाद प्राप्त वेतन और भत्तों की पूरी वसूली सरकार के खजाने में जमा करनी होगी। याचिकाकर्ता को अन्य सभी सेवा लाभों का अधिकार भी दिया गया।
यह निर्णय एक महत्वपूर्ण उदाहरण है कि कैसे न्यायालय लंबी और बेदाग सेवा रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए सजा का पुनरावलोकन करता है। इस मामले में न्यायालय ने सजा को असंगत माना और यह सुनिश्चित किया कि याचिकाकर्ता के अधिकारों की रक्षा की जाए।