केरल हाई कोर्ट ने फैटी लिवर को चार साल की देरी के लिए उचित कारण मानने से किया इनकार


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-11-23 08:05:38



 

चार साल की देरी के बाद अपील दाखिल करने के असफल प्रयास में, एक याचिकाकर्ता ने 'फैटी लिवर' की बीमारी को आधार बनाकर राहत मांगी। हालांकि, केरल हाई कोर्ट ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति गोपीनाथ पी. की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामले में कानूनी समय-सीमा का उल्लंघन स्वीकार्य नहीं हो सकता।

याचिका और मुख्य दलीलें:

यह मामला 2020 में जारी किए गए केंद्रीय और राज्य जीएसटी अधिनियमों के तहत आदेशों से संबंधित था। याचिकाकर्ता ने यह दावा किया कि ‘फैटी लिवर’ की बीमारी के कारण डॉक्टरों ने उन्हें बेड रेस्ट की सलाह दी थी, जिसके चलते वे समय पर अपील दायर नहीं कर सके। उन्होंने यह अपील 2024 में दाखिल की, लेकिन अदालत ने इसे "असंगत देरी" मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने यह भी कहा कि प्रस्तुत किए गए चिकित्सा प्रमाणपत्र पर भरोसा करना कठिन है।

न्यायालय का रुख:

न्यायालय ने सिंह एंटरप्राइजेज बनाम सीसीई (2008) जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत, उच्च न्यायालय समय सीमा बढ़ाने का अधिकार नहीं रखता। यहां तक कि जब संविधान के तहत समय सीमा तय नहीं की जाती, तो भी अत्यधिक विलंब याचिका खारिज करने का पर्याप्त आधार हो सकता है। न्यायमूर्ति ने कहा कि याचिकाकर्ता की स्थिति “संदेहास्पद” प्रतीत होती है और इस मामले में "अतिरिक्त छूट" देना अनुचित होगा।

कर विभाग की दलील:

प्रशासन ने तर्क दिया कि आदेश फरवरी 2020 में पारित किए गए थे और अपील फरवरी 2024 में दायर की गई थी। देरी के कारण को ‘असंतोषजनक’ बताते हुए, उन्होंने याचिकाकर्ता की चिकित्सा स्थिति को पर्याप्त आधार मानने से इनकार किया।

अदालत का निष्कर्ष:

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने चार वर्षों की देरी का उचित और ठोस कारण नहीं दिया है। अनुच्छेद 226 के तहत अपील को खारिज करते हुए, अदालत ने यह दोहराया कि कानून के प्रति सख्ती आवश्यक है ताकि न्यायिक प्रक्रिया में अनुशासन बना रहे।


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