( सुप्रीम कोर्ट ने दिया पिछले फैसले का हवाला )परिवार न्यायालय पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: अपील के नियमों पर जोर
के कुमार आहूजा 2024-11-23 07:32:27

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले की सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 10 के तहत सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के प्रावधान परिवार न्यायालय में पूरी तरह लागू होते हैं। इसी आधार पर, "रिट ऑफ प्रोबिशन" की मांग करते हुए दाखिल याचिका को खारिज कर दिया गया, क्योंकि इसके लिए अपील का प्रावधान मौजूद है।
केस की पृष्ठभूमि
इस मामले में, पति (याचिकाकर्ता) और पत्नी (उत्तरदाता) के बीच मतभेद के कारण कई मुकदमे दर्ज हुए। याचिकाकर्ता ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दायर की थी। 16 और 28 जनवरी 2019 को संबंधित आदेश पारित किए गए, जिससे तलाक को मंजूरी दी गई। इसके बाद, पत्नी ने CPC के ऑर्डर IX, रूल 13 और धारा 151 के तहत याचिका दायर की, जिसमें पूर्व आदेशों पर रोक लगाने की मांग की गई।
गोंडा के प्रधान न्यायाधीश ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए नोटिस जारी किए, जिससे पति नाराज होकर हाईकोर्ट पहुंचे।
कोर्ट का विश्लेषण: क्यों खारिज हुई याचिका?
न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने आदेश में कहा कि "रिट ऑफ प्रोबिशन" केवल उन मामलों में जारी हो सकती है, जहां निचली अदालत अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई करती है। लेकिन इस केस में निचली अदालत ने सीपीसी के तहत अधिकार का सही उपयोग किया था।
सिविल प्रक्रिया संहिता और परिवार न्यायालय
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 10 के अनुसार, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के सभी प्रावधान परिवार न्यायालय में लागू होते हैं। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि किसी भी कानूनी प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय और निष्पक्षता का पालन हो।
सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों का हवाला
कोर्ट ने "रवींद्र सिंह बनाम फाइनेंशियल कमिश्नर, पंजाब" मामले का जिक्र करते हुए कहा कि न्यायालय को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के मामलों में "एक्स पार्टी" आदेशों को रद्द करने का अधिकार है। यह तर्क याचिकाकर्ता के दावे को कमजोर करता है कि निचली अदालत अपील के बिना ऐसा नहीं कर सकती।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि अपील का रास्ता अपनाए बिना इस प्रकार की रिट दाखिल करना सही नहीं है। इस आदेश ने तलाक और परिवार न्यायालय से जुड़े मामलों में सीपीसी के महत्व को और अधिक स्पष्ट किया।