2050 तक 50 प्रतिशत बच्चे चश्मा लगाएंगे? जानिए क्यों बढ़ रही है आंखों की समस्याएं


के कुमार आहूजा कान्ता आहूजा  2024-09-29 21:21:30



2050 तक 50 प्रतिशत बच्चे चश्मा लगाएंगे? जानिए क्यों बढ़ रही है आंखों की समस्याएं

क्या आपने कभी सोचा है कि आपके बच्चों की आंखें इतनी जल्दी क्यों कमजोर हो रही हैं? एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि दुनिया भर में हर तीन में से एक बच्चे की नजर कमजोर हो चुकी है और अगर यही रफ्तार जारी रही, तो 2050 तक आधे से अधिक बच्चों को दृष्टि संबंधी समस्याएं होंगी। यह चौंकाने वाला खुलासा इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि कोरोना महामारी के बाद से स्क्रीन समय में भारी वृद्धि हुई है, जिससे बच्चों की आंखों पर अत्यधिक दबाव पड़ा है।

आंखों की समस्याओं में हो रही है वृद्धि:

'ब्रिटिश जर्नल ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी' में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, 1990 की तुलना में 2023 में बच्चों की आंखों की समस्याओं में 36% की वृद्धि हुई है। 50 देशों के 50 लाख से अधिक बच्चों पर किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि एशियाई देशों में स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। जापान में 85% बच्चों की नजर कमजोर है, वहीं दक्षिण कोरिया और चीन में यह आंकड़ा 73% और रूस में 40% है। यह सभी बच्चे 10 साल या उससे कम उम्र के हैं।

कोविड-19 महामारी का प्रभाव:

कोविड-19 महामारी के दौरान लॉकडाउन और स्कूलों की ऑनलाइन पढ़ाई ने बच्चों की दृष्टि को और अधिक प्रभावित किया है। स्क्रीन के सामने लंबे समय तक बैठने और बाहरी गतिविधियों की कमी ने बच्चों की आंखों पर बुरा असर डाला है। शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर यही स्थिति बनी रही, तो 2050 तक 740 मिलियन बच्चे मायोपिया से प्रभावित होंगे, जो एक बड़ा स्वास्थ्य संकट बन सकता है।

समस्या के प्रमुख कारण:

 ज्यादा स्क्रीन टाइम: बच्चों में स्मार्टफोन, टैबलेट और टीवी के बढ़ते उपयोग ने उनकी आंखों की मांसपेशियों पर अधिक दबाव डाला है। यह समस्या उन बच्चों में ज्यादा देखी जा रही है, जो पढ़ाई के लिए ज्यादा समय तक स्क्रीन के सामने बैठते हैं।

 शैक्षिक दबाव और प्रारंभिक शिक्षा: एशियाई देशों जैसे सिंगापुर और हांगकांग में, बच्चे 2 साल की उम्र में ही स्कूल जाना शुरू कर देते हैं। कम उम्र में पढ़ाई और स्क्रीन के अधिक उपयोग से आंखों पर जोर पड़ता है, जिससे मायोपिया जैसी समस्याएं हो जाती हैं।

 जनसंख्या और जीवनशैली में बदलाव: शहरी क्षेत्रों में बच्चों का ज्यादातर समय घर के अंदर बिताना और बाहर खेलने-कूदने का कम मौका मिलना भी इस समस्या का कारण है। इसके अलावा, लड़कियों में यह समस्या ज्यादा देखी जा रही है, क्योंकि वे घर में अधिक समय बिताती हैं और बाहरी गतिविधियों में उनकी भागीदारी कम होती है।

क्षेत्रीय विषमताएं:

एशियाई देशों में, विशेष रूप से जापान, दक्षिण कोरिया और चीन में मायोपिया की दर सबसे अधिक है। इसके विपरीत, अफ्रीकी देशों में यह समस्या अपेक्षाकृत कम है, जहां बच्चों की स्कूल जाने की उम्र 6-8 साल होती है। यह दर्शाता है कि कम उम्र में स्कूल शुरू करने और अत्यधिक पढ़ाई का बच्चों की आंखों पर बुरा असर पड़ता है।

रोकथाम और उपचार:

बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करना: विशेषज्ञों का सुझाव है कि बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने की कोशिश करनी चाहिए और उन्हें बाहरी गतिविधियों में संलग्न करना चाहिए। इससे उनकी आंखों की मांसपेशियों को आराम मिलेगा और दृष्टि समस्याओं में कमी आएगी।

 आंखों की नियमित जांच: बच्चों की आंखों की नियमित जांच करवाना बेहद जरूरी है। इससे शुरुआती दौर में ही समस्या का पता लगाया जा सकता है और उचित उपचार किया जा सकता है।

 पोषण और आहार: बच्चों के आहार में विटामिन A, C और E से भरपूर खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए, जो आंखों की सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं।

फिलहाल, बच्चों में बढ़ती आंखों की समस्याएं एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट का रूप ले रही हैं, जो आने वाले वर्षों में और गंभीर हो सकती है। इसके लिए जरूरी है कि माता-पिता और शिक्षकों को जागरूक किया जाए और बच्चों को स्क्रीन टाइम और बाहरी गतिविधियों के बीच संतुलन बनाना सिखाया जाए। यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में स्थिति और भी भयावह हो सकती है।

Disclaimer: खबर में दी गई जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।


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